Thursday, 24 September 2015

गिरह पुराने - -

न खोल गिरह पुराने
कुछ दर्द अनजाने,
रहने दे यूँ ही
गुमशुदा
अनकहे अफ़साने। उन
लोगों की थी शायद
अपनी मजबूरी
कभी गले
से लगाया, कभी लगे
ठुकराने। बेशक
हर कोई
यहाँ,
है अपनी धुरी से बंधा,
इक ज़रा सी बात
पर बनते हैं
हज़ार
 बहाने। न मैं नीलकंठ
बन सका, और न
तू  ही मीरा
चन्दन
और भुजंग हैं यहाँ मित्र
बहुत पुराने। न खोल
गिरह पुराने कुछ
दर्द अनजाने।

* *
- शांतनु सान्याल

Tuesday, 8 September 2015

आप साथ हो लिए - -

हम यूँ ही अपने आप में
 रूह ए  जज़्ब थे,
न जाने
किस मोड़ पे, आप साथ
हो लिए। सुरमयी
कोई शाम
थी या
मख़मली रात, न जाने -
किस पल दिल
अपना हम
खो
दिए। यूँ तो कम न थे
ज़िन्दगी में दर्द
ओ ग़म,
फिर
न जाने क्यूँ दर्द नया -
सीने में बो लिए।
अजीब सी
कैफ़ियत
है दिल
की आजकल कभी यूँ
ही हंस लिए कभी
बेवजह रो
लिए।

* *
- शांतनु सान्याल

Sunday, 6 September 2015

निगाहे नूर - -

मेरी चाहतों को काश
एक मुश्त सुबह
की धूप
मिलती, यक़ीन मानो
मेरी ज़िन्दगी भी
फूलों से कम
न होती।
ताहम कोई शिकायत
नहीं इस कमतर
रौशनी के लिए,
इक ज़रा
निगाहे
नूर तेरी काफ़ी है मेरी
ज़िन्दगी के लिए।
* *
- शांतनु सान्याल