Follow by Email

Sunday, 30 August 2015

फिर कोई होगा शिकार - -

कोई तेज़ रफ़्तार ट्रेन गुज़री है अभी अभी। 
पटरियों में कुछ ताज़े, काँपते ज़ख्म
हैं अभी तलक ज़िंदा। वादियों
में फिर उभरा है चाँद,
फिर कोई होगा
शिकार
खुली चाँदनी में। न देख मुझे आज की रात
यूँ क़ातिल अंदाज़ में। इक तिलिस्म
सा है तेरी पुरअसरार मुहोब्बत 
में, कि जो भी फँस जाए
उम्रभर न निकल
पाए तेरी
निगाह ए जाल से। तुझे ख़ुद ये मालूम नहीं
कि तेरे दम से है रौशन नीला फ़लक
दूर तक, और ज़मीं है मुबारक
तेरे रुख़ ए जमाल से।

* *
- शांतनु सान्याल
art of dang can 
http://sanyalsduniya2.blogspot.in/
https://www.facebook.com/shantanu.sanyal.new

Saturday, 29 August 2015


Friday, 28 August 2015

जाते जाते - -

कुछ लम्हात यूँ ही और
नज़दीक रहते, कुछ
और ज़रा जीने
की चाहत
बढ़ा
जाते। ताउम्र जिस से
न मिले पल भर
की राहत,
काश,
कोई लाइलाज मर्ज़ 
लगा जाते। किस
मोड़ पे फिर
रुकेगी
फ़स्ले बहार, काश, जाते
जाते अपना पता
बता जाते।
तुम्हारे
जाते ही घिर आए
बादलों के साए,
मन - मंदिर
में कोई
साँझ दीया जला जाते।
कुछ अनमनी सी हैं
रातरानी की
डालियाँ,
हमेशा
की तरह गंधकोशों में
ख़ुश्बू बसा
जाते। 

* *
- शांतनु सान्याल
   http://sanyalsduniya2.blogspot.in/

Monday, 24 August 2015

कहीं गुम है ज़िन्दगी - -

हालांकि हम बढ़ चले हैं नए
दिगंत की ओर, फिर भी
कहीं न कहीं, हम हैं
बहुत एकाकी,
अंदर तक
लिए
शून्यता तकते हैं नीलाकाश,
और प्रदर्शित करते हैं,
छद्म, आत्म -
विभोर।
दरअसल, सीमाहीन हैं सभी
अभिलाषित सूची,आईने
और चेहरे के बीच
कहीं गुम है
ज़िन्दगी,
और
अजनबी सी सुबह खड़ी है - -
कहीं आख़री छोर।

* *
-  शांतनु सान्याल 

http://sanyalsduniya2.blogspot.in/

Wednesday, 5 August 2015

उस मोड़ पे कहीं - -

मैं आज भी मुंतज़िर तन्हा खड़ा हूँ
उसी मोड़ पर, जहाँ मधुमास
ने लौटने का कभी वादा
किया था, हर एक
चीज़ है वहीँ
अपनी
जगह यथावत, लेकिन कब सूख
गई सजल भावनाओं की ज़मीं,
यक़ीन जानो, मुझे कुछ
भी ख़बर नहीं।
झरते हुए
गुलमोहर ने मुझ से कहा अब लौट
भी जाओ अपने घर कि, आईने
से बेदिली ठीक नहीं, गुज़रा
हुआ ज़माना, था कोई
रंगीन बुलबुला,
जो दिल से
उठा और हवाओं में कहीं हो गया -
लापता, अब भीगे साहिल में
नहीं बाक़ी क़दमों के निशां,
ख़ुद फ़रेबी से अब
क्या फ़ायदा।

* *
- शांतनु सान्याल
http://sanyalsduniya2.blogspot.in/
 

Monday, 3 August 2015

नेपथ्य में कहीं - -

नेपथ्य में कहीं, कोई तो है
खड़ा अदृश्य,जो
मझधार में
भी
जीने की आस बढ़ा जाए।
मानो या न मानो,
अपना अपना
है ख़्याल,
पत्थरों
में कहीं है वो, या मिले
शिफ़र हाल, हर
हाल में
लेकिन वो ज़िन्दगी सजा
जाए। नेपथ्य में कहीं,
कोई तो है खड़ा
अदृश्य,
जो मझधार में भी जीने
की आस बढ़ा जाए।
दूर दूर तक
फैली है
उसकी निगाहों की रौशनी,
कोई चीज़ नहीं पोशीदा,
न कोई बात
अनसुनी,
हज़ार
पर्दों में भी वो अपनी झलक
दिखा जाए। नेपथ्य में
कहीं, कोई तो है
खड़ा
अदृश्य,जो मझधार में भी
जीने की आस बढ़ा
जाए।

* *
- शांतनु सान्याल
 

http://sanyalsduniya2.blogspot.in/