Thursday, 23 July 2015

राज़ ए गहराई - -

न जाने कैसा है वो शीशा
ए अहसास, नज़र
हटते ही होता
है टूटने
का गुमान। क़रीब हो जब
तुम, लगे सारा
कायनात यूँ
हथेली
में बंद किसी जुगनू की -
मानिंद, ओझल होते
ही बिखरता है पल
भर में गोया
तारों भरा
नीला
आसमान। कई बार देखा
है उसे दिल के आईने
में,बारहा तलाशा
है उसे चश्म
ए समंदर
में यूँ
दूर तक डूब कर, फिर भी
इस इश्क़ ए तलातुम
में, राज़ ए गहराई
जानना नहीं
आसान।

* *
- शांतनु सान्याल  


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Wednesday, 22 July 2015

कहीं वो ही न हो - -

फिर पाजंज़ीर चल
पड़ा हूँ तनहा,
सुना है
तेरी रौशन गली में
है तहरीक ए
अंधेरा।
फिर सज चले हैं
मीनाबाज़ार
शाम
ढले, फिर मुझे
तमाशबीनों
ने आ के
है घेरा।
बिछी है तमाम
रास्ते शतरंज
ए बिसात,
मोहरों
में कौन है सांप
और कौन
सपेरा।
कहना है मुश्किल
कहीं वो  ही
न हो
मेरा क़ातिल,जिसने
मुद्दतों से मेरे
आस्तीं पे
बना
रखा है अपना डेरा।

* *
- शांतनु सान्याल
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Tuesday, 21 July 2015

शब ए इन्तज़ार - -

शब ए इन्तज़ार ढल गई,
दूर तक बिखरे पड़े हैं
बेतरतीब, टूटे
हुए ख़्वाब।
कुछ उनींदी आँखों की
वीरान बस्तियाँ,
और कुछ
कोहरे
में लिपटी ख़मोशियाँ।
लगा के आग,
ख़ुद अपने
अंजुमन

में कि
हम ढूंढते हैं बारिश,
भरे सावन में।
तमाम रात
जलते
बुझते रहे मेरे जज़्बात 
उम्र से लम्बी थी
कहीं कल 
बरसात
की
रात। हर इक  आहट
में टूटती रही
जंज़ीर ए
नफ़स,
हर
इक पल बिखरते रहे
इश्क़ ए गुलाब।
शब  ए 
इन्तज़ार ढल गई, दूर
तक बिखरे पड़े हैं
बेतरतीब,
टूटे
हुए ख़्वाब - -

* *
- शांतनु सान्याल 

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शब - रात
 

Saturday, 11 July 2015

फिर मिले न मिले - -

फिर खुले न खुले, दर
ए ज़िन्दां किसे
ख़बर, अभी
तो भीग
लें इन बारिशों में खुल
कर, न रोक ख़ुद को
यूँ चहार दिवारी
के अंदर।
मवाली हवाओं के संग
उड़ जाएं सभी
हिजाब,
दिल चाहे होना आज
गहराइयों तक
तर बतर।
इल्ज़ाम
कोई, ग़ैर इख़्लाक़ी - -
का लगे तो लगे,
अभी तो जीलें
खुली
हवाओं में यूँ ही बेख़बर।
फिर मिले न मिले,
ज़िन्दगी को
ये नायाब
पल,
क्यों न रोक लें इन्हें - -
अपनी निगाहों में
ऐ मेरे हम -
सफ़र।

* *
- शांतनु सान्याल

 
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Monday, 6 July 2015

ख़ामोशी - -

उस ख़ामोशी में है कोई
मुक्कमल जज़्बात
या सदियों से
ठहरा
हुआ कोई तूफ़ान। इक
कहानी जिसे लोग
दोहराते हैं
बारम्बार
फिर भी जो पड़ा रहता है 

यूँ ही बिलाउन्वान।
ज़िन्दगी की है
अपनी ही
अलग
दिलकशी, कभी इक बूंद
भी नहीं मय्यसर
लबों को,और
कभी
सैलाबी आसमान। उन
पोशीदा लकीरों की
गहराई, अब
तक किसी
को न
समझ आई, हर तरफ
है इक पुरअसरार
ख़ुश्बू, लेकिन
मुख़ातिब
नहीं 

कोई फूल और नहीं - -
नाज़ुक कोई 
गुलदान।

* *
- शांतनु सान्याल 

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