Sunday, 29 November 2015

चाहतों का असर - -

चाहे कोई कितना भी
उठ जाए आसमां 
की ओर,
हर हाल में उसे लौटना
है इक दिन धूसर
जहां की
ओर।
वो तमाम रंग रोगन,
रफ़्ता-रफ़्ता हो
चले हैं फ़ीके,
ज़िन्दगी
बढ़ चली है फिर आज,
किसी अदृश्य
मेहरबां
की
ओर। तुम्हारी चाहतों
का असर है जो
अपनी उम्र
लम्बी
हो गई, वरना कब से
हम भी गुज़र
जाते
सुदूर जाते कारवां की
ओर।
* *
- शांतनु सान्याल