Saturday, 17 October 2015

नाज़ुक हलफ़ - -

पुरअसरार धुंध सा है
बिखरा हुआ दूर
दूर तक,
रूह
परेशां मेरी तलाशे है
तुझे हो कर
बेक़रार।
धरती
और आसमां के बीच
है कोई मूक संधि,
या निगाहों की
चाँदनी
समेटे है मुझे बार बार।
तेरे पहलू से हैं बंधे
हुए सारे जहाँ
की मस्सरतें
क्यूँ कर
न जागे, मेरे दिल में
ख़्वाहिशें हज़ार।
कोई अनजान
सा नशा है
तेरी
आँखों में शायद, न
पीने का हलफ़
मुझसे टूट
जाता है
बार बार।
* *
- शांतनु सान्याल