Wednesday, 5 August 2015

उस मोड़ पे कहीं - -

मैं आज भी मुंतज़िर तन्हा खड़ा हूँ
उसी मोड़ पर, जहाँ मधुमास
ने लौटने का कभी वादा
किया था, हर एक
चीज़ है वहीँ
अपनी
जगह यथावत, लेकिन कब सूख
गई सजल भावनाओं की ज़मीं,
यक़ीन जानो, मुझे कुछ
भी ख़बर नहीं।
झरते हुए
गुलमोहर ने मुझ से कहा अब लौट
भी जाओ अपने घर कि, आईने
से बेदिली ठीक नहीं, गुज़रा
हुआ ज़माना, था कोई
रंगीन बुलबुला,
जो दिल से
उठा और हवाओं में कहीं हो गया -
लापता, अब भीगे साहिल में
नहीं बाक़ी क़दमों के निशां,
ख़ुद फ़रेबी से अब
क्या फ़ायदा।

* *
- शांतनु सान्याल
http://sanyalsduniya2.blogspot.in/