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Sunday, 30 August 2015

फिर कोई होगा शिकार - -

कोई तेज़ रफ़्तार ट्रेन गुज़री है अभी अभी। 
पटरियों में कुछ ताज़े, काँपते ज़ख्म
हैं अभी तलक ज़िंदा। वादियों
में फिर उभरा है चाँद,
फिर कोई होगा
शिकार
खुली चाँदनी में। न देख मुझे आज की रात
यूँ क़ातिल अंदाज़ में। इक तिलिस्म
सा है तेरी पुरअसरार मुहोब्बत 
में, कि जो भी फँस जाए
उम्रभर न निकल
पाए तेरी
निगाह ए जाल से। तुझे ख़ुद ये मालूम नहीं
कि तेरे दम से है रौशन नीला फ़लक
दूर तक, और ज़मीं है मुबारक
तेरे रुख़ ए जमाल से।

* *
- शांतनु सान्याल
art of dang can 
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