Thursday, 23 July 2015

राज़ ए गहराई - -

न जाने कैसा है वो शीशा
ए अहसास, नज़र
हटते ही होता
है टूटने
का गुमान। क़रीब हो जब
तुम, लगे सारा
कायनात यूँ
हथेली
में बंद किसी जुगनू की -
मानिंद, ओझल होते
ही बिखरता है पल
भर में गोया
तारों भरा
नीला
आसमान। कई बार देखा
है उसे दिल के आईने
में,बारहा तलाशा
है उसे चश्म
ए समंदर
में यूँ
दूर तक डूब कर, फिर भी
इस इश्क़ ए तलातुम
में, राज़ ए गहराई
जानना नहीं
आसान।

* *
- शांतनु सान्याल  


http://sanyalsduniya2.blogspot.in/