Wednesday, 22 July 2015

कहीं वो ही न हो - -

फिर पाजंज़ीर चल
पड़ा हूँ तनहा,
सुना है
तेरी रौशन गली में
है तहरीक ए
अंधेरा।
फिर सज चले हैं
मीनाबाज़ार
शाम
ढले, फिर मुझे
तमाशबीनों
ने आ के
है घेरा।
बिछी है तमाम
रास्ते शतरंज
ए बिसात,
मोहरों
में कौन है सांप
और कौन
सपेरा।
कहना है मुश्किल
कहीं वो  ही
न हो
मेरा क़ातिल,जिसने
मुद्दतों से मेरे
आस्तीं पे
बना
रखा है अपना डेरा।

* *
- शांतनु सान्याल
http://sanyalsduniya2.blogspot.in/