Saturday, 13 December 2014

संदली परछाइयाँ - -

कभी फूलों से लदी लदी डालियाँ,
कभी दूर तक छायी रहीं
ख़मोशियाँ, कभी
तुम ख़ुद
में रहे उलझे उलझे से, तमाम -
दुनिया से अलग थलग,
कभी मुझे तलाशती
रही मेरे अंदर
माज़ी की
थकन भरी तन्हाइयाँ, न कोई
दस्तक, न ही ख़ैर ख़बर,
इक ज़माने से है
ज़िन्दगी
मुन्तज़िर कि इश्तबाहा ही सही,
सुलगते रूह को, छू जाए
यूँ ही उनकी संदली
परछाइयाँ - -

* *
- शांतनु सान्याल

http://sanyalsduniya2.blogspot.in/
painting by artist Qiang Huang 2