Tuesday, 30 September 2014

तेरी सांसों में कहीं - -

ये इश्क़ कहीं न जां से गुज़र जाए,
न देख फिर मुझे यूँ पुरअसरार
निगाहों से, जुम्बिश ए
जुनूं, कहीं दिल
से न छलक
जाए !
रहने दे भरम ज़िन्दा, यूँ ही मेरे -
जिस्म ओ जां में कि, तू है
मुक्कमल शामिल,
रूह ए गहराई
में दूर
तक, रहने दे यूँ ही लापरवाह मुझे
अपने पलकों के ज़ेर ए साया,
कहीं छूते ही सुरमयी
अहसास न बिखर
जाए !
तेरी सांसों में कहीं है मेरी मंज़िल,
काश ! ये वक़्त ज़रा ठहर
जाए, ये इश्क़ कहीं
न जां से गुज़र
जाए,

* *
- शांतनु सान्याल


 

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art by Marchella Piery.jpg 2

ख़्वाब कोई अंतिम पहर वाले - -

कदाचित वो बरसे, आधी रात महीन
मेघ बन कर, अस्तित्व मेरा
फिर बनना चाहे मरू -
उद्यान कोई !
निःशर्त
हो आँखों का मौन अनुबंध, आजन्म
किसी के लिए फिर जागे है दिल
में अरमान कोई ! उड़ रहे
हैं, रंगीन शलभ या
निगाहों में
तैरते
हैं, ख़्वाब कोई अंतिम पहर वाले, पास
रह कर भी न जाने क्यों इतना
है अनजान कोई ! बदल
तो लूँ ज़िन्दगी की
तमाम
नाकामियां, दर्द भरी परछाइयाँ, काश,
कहीं से मिल जाए, ख़ानाबदोश
मेहरबान कोई, अस्तित्व
मेरा फिर बनना चाहे
मरू उद्यान
कोई !

* *
- शांतनु सान्याल

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art by lexy sundell

Monday, 29 September 2014

बूंदों का हिसाब - -

उन गर्म बूंदों का हिसाब न दे - -
सका कोई, जो आँखों से
टूट कर निःशब्द,
भाप बन गए,
वो तमाम
दर्द
जो मरियम के सीने में थे दफ़्न
कहीं, वक़्त के साथ बंजर
ज़मीं बन गए, फिर
भी निकलती
है दिल
से दुआएँ दूर तक, मसीहा न सही
वो तमाम अपने पराए, कम
अज़ कम इंसान तो बन
गए होते, क्या
मानी है
उन पवित्र गुम्बदों की रौशनी का,
ग़र इतिहास लिखा जाए
मासूमों के ख़ून से,
काश वो समझ
पाते दर्द,
किसी बिलखती माँ की आँखों का.

* *
- शांतनु सान्याल

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In the Mist of a Memory by Hanne Lore Koehler

Tuesday, 16 September 2014

ख़ूबसूरत भरम - -

मिलो कुछ इस तरह खुल के, कि देर
तक महके दिलों के दरीचे, वो
अपनापन, जिसमें हो
अथाह पवित्र
गहराई !
खिलो कुछ इस तरह दिल से, कि - -
मुरझा के भी रहे ख़ुश्बूदार,
नाज़ुक जज़्बात !
तमाम रास्ते
यकसां
ही नज़र आए जब कभी देखा दिल की
नज़र से, ये बात और थी, कि
ज़माने ने लटकाए रखी
थी मुख़्तलिफ़
तख़्ती !
लेकिन, हमने भी दर किनार किया वो
सभी ख़्याल ए ईमान, इक
इंसानियत के सिवा,
तुम मानो या
न मानो,
इक यही सच्चा धरम है, बाक़ी कुछ भी
नहीं ये जहां, इक ख़ूबसूरत भरम
के सिवा।

* *
- शांतनु सान्याल




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painting  by Ann Mortimer

Sunday, 14 September 2014

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art by Madhumita Bhattacharya

Friday, 12 September 2014

तख़लीक़ ए साज़िश - -

वो तमाम वाक़िफ़ चेहरे, और
उनका यूँ ख़ूबसूरती से
रुख़ बदलना क्या
कहिए, जो
भी हो
तल्ख़ी ए ज़िन्दगी क्या चीज़
है, इस बहाने मालूम तो
हुआ, वो शख़्स
जो अक्सर
करता
रहा दावा, उम्र भर की दोस्ती
का, उसी ने बरख़िलाफ़
मेरे की थी तख़लीक़
ए साज़िश !
लम्हा
लम्हा सांसों में घुल कर, यूँ -
उसका रूह ए क़ातिल
में बदलना क्या
कहिए - -

* *
- शांतनु सान्याल

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painting by artist Fabio Cembranelli

Wednesday, 10 September 2014

घूमता रंगमंच - -

मुझे मालूम है अच्छी तरह, दुनिया
का वही अनवरत लेनदेन,
निःशर्त यहाँ कोई
नहीं चलता
साथ
दो क़दम, यूँ तो कहने को है अनंत -
अनुबंध का साथ अपना, न
तेरे चेहरे में होगी कोई
दीर्घ, दुःख की
लकीर !
न मेरी निगाहों में है बाक़ी क़तरा ए
नमी, कि वक़्त हर घाव को
भर देता है बिना कुछ
कहे, जानता हूँ
तुम भी
इक दिन भूला दोगे सब कुछ, पलक
गिरते ही बदल जाते हैं सभी
मंज़र, सिर्फ़ घूमता रह
जाता है रंगमंच
सामने।

* *
- शांतनु सान्याल

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art by Colleen Sanchez

Saturday, 6 September 2014

शीशे के ख़्वाब - -

कोई पारदर्शी पंखों वाला ख़्वाब, अक्सर
मुझे ले जाता है बहोत दूर, इक
महाशून्य के बहोत अंदर,
जहाँ बसती है रंगीन
तितलियों की
ख़ूबसूरत
दुनिया, फूलों के आकाशगंगा, ज़िन्दगी
जहाँ झूलती है सप्तरंगी झूला,
हर चेहरे में है उभरती
ताज़गी, हर इक
छुअन में
जहाँ है मौजूद दुआओं का असर, इक - -
ऐसी दिलकश हक़ीक़त, जिसमें
बसते हैं ख़ालिस जज़्बात,
या यूँ कह लें जहाँ
हर दिल में,
कहीं न कहीं बसता है इक मासूम बच्चा,
और उसकी आँखों में उभरते हैं
मुक़द्दस सपने, जो गुमनाम
रह कर भी ज़िन्दगी
में रंग भरते हैं
बेशुमार।

* *
- शांतनु सान्याल
 

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art by samir mondal India