Friday, 7 November 2014

ख़्वाबों के सिलसिले - -

फिर उभर चले हैं, निगाहों में
ख़्वाबों के सिलसिले, इक
अजीब सी ख़लिश
है आजकल
दिल
में मेरे, वादियों में खिल रहे
हैं गुलों की क्यारियां,
फिर महक रही
है किसके
लिए
न जाने मेरी तन्हाइयां, वो -
कौन है, जो ख़ुश्बुओं में
ढल कर, रफ़्ता -
रफ़्ता
जिस्म ओ जां से उठ कर - -
मेरी रूह तक कर चला
है जज़्ब इंतहा,
कहीं ये
जुनूं बढ़ते बढ़ते, न कर जाए
मुझे ख़ुद अपने से जुदा !

* *
-  शांतनु सान्याल

 

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