Sunday, 9 November 2014

पोशीदा नज़्म कोई - -

कभी कभी,यूँ ही बेवजह, किसी
सुनसान से, पहाड़ी स्टेशन
के प्लेटफ़ार्म पे, रहता
है खड़ा मेरा वजूद,
कुछ अनमना,
तन्हा सा !
आधी रात की, वो आख़री रेल - 
जब गुज़रती है, धड़धड़ाती
हुई, पुरअसरार वादियों
की जानिब, दूर दूर
तक फैली
हुई चाँदनी में करती है मेरी रूह  
गुमशुदा नज़्म की तलाश, 

किसी जंगली नदी के 
किनारे, महुवा या 
खैर के तने
पे कहीं
जहाँ कभी मिलकर हमने उकेरा
था इक दिल का निशान, और
लिखी थी ख़ूबसूरत सी,
पोशीदा नज़्म कोई
लाउन्वान !

* *
- शांतनु सान्याल 


 
 

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Still Life After Shirley Trevena