Tuesday, 11 November 2014

दर्द गुज़िश्ता - -

बेहतर है न कुरेद बार बार, यूँ
दर्द गुज़िश्ता, तमाम
रात सुलगता
रहा नीला
आसमान, और गिरे चश्म ए
ओस आहिस्ता आहिस्ता,
न जाने वो ख़्वाब था,
या साहब नफ़स
मेरा, नादीद
हो कर
भी कर गया मुझे यूँ वाबस्ता, -
जब होश लौटे, उठ चुका
था नूर शामियाना
दूर तक थी
ख़मोशी
और इक अंतहीन लम्बा सा
रस्ता, बेहतर है न कुरेद
बार बार, यूँ दर्द
गुज़िश्ता,

* *
-  शांतनु सान्याल 


 

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