Wednesday, 16 July 2014

बाज़ी ए आतिश - -

सहमे सहमे से हैं क्यूँ तेरे अहसास,
तू मेरे क़रीब है या, कोई पिन्हां
है तेरे आसपास, न खेल
यूँ बाज़ी ए आतिश
से इसमें इक
दिन
झुलसना है लाज़िम, न खो दे कहीं
तू होश ओ हवास, कोई पिन्हां
है तेरे आसपास, मैं वो
शै हूँ जो हर दौर
में उभर
आए
गर्द ओ ग़ुबार से भी, कि मेरा इश्क़
है हमआहंग तेरी साँसों से,
अब बहोत मुश्किल
ही नहीं बल्कि
नामुमकिन
सा है
तेरा यूँ मेरे नफ़स से बाहर जाना - -

* *
- शांतनु सान्याल

 

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flower-arrangement-in-glass-vase 
पिन्हां  - छुपा हुआ 
बाज़ी ए  आतिश  - आग का खेल 
हमआहंग  - एकाकार 
नफ़स - आत्मा