Wednesday, 7 May 2014

लूका - छुपी का खेल - -

लूका छुपी ही था ग़म ओ ख़ुशी के 
दरमियां, नाहक कोसते 
रहे हम तक़दीर 
को, हर 
एक चीज़ के हैं दो पहलू, रौशनी - 
की दूसरी तरफ़ रहता है 
हमेशा की तरह 
वजूद ए 
अंधेरा, बेवजह पढ़ते रहे हम यूँ -
ही हथेली के तहरीर को, 
क़ुदरत का 
अपना 
ही है दस्तूर, बदलना जिसे नहीं -
आसां, बहोत कोशिश की 
दिलों को जीतने के 
लिए, लेकिन 
नाकाम 
रहे हम हर दफ़ा, समझ न पाए - 
कभी हम पोशीदा उस 
तदबीर को, नाहक
कोसते रहे 
हम 
ताउम्र यूँ ही तक़दीर को - - - - - 

* * 
- शांतनु सान्याल 

http://sanyalsduniya2.blogspot.in/
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