Saturday, 24 May 2014

पिघलता रहा आकाश - -

बहोत फीके फीके से लगे झूलते 
सुनहरे अमलतास, न जाने 
कैसा दर्द दे गया कोई,
गहराता रहा 
हर पल 
जीवन में एकाकीपन, वैसे तो -
जन अरण्य था यथावत
मेरे आसपास, 
वीथिका  
के दोनों तरफ, वन्य कुसुमों से 
लदी डालियों से छलक 
रहे थे मदिर गंध,
न जाने 
फिर भी बहोत नीरस था तुम - 
बिन मधुमास, तृष्णा 
मेरी रही अनबुझ,
अपनी जगह,
मरू प्रांतर 
की तरह, कहने को बारम्बार -
पिघलता रहा आकाश !

* * 
- शांतनु सान्याल 




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