Thursday, 15 May 2014

ये नहीं आख़री मंज़िल - -

ये नहीं आख़री मंज़िल, समन्दर के 
उस पार भी कुछ जुगनुओं 
की मानिंद, चमकते 
किनारे हैं 
मुंतज़िर, चलो फिर इक बार चलें -
कहीं दूर, किसी उम्मीद की 
साहिल में, उतार भी 
दो जिस्म ओ 
जां से ये 
लिबास क़दीमी, उभरने को हैं कुछ 
बेताब से आसमानी पैरहन !
मँझधार में आ कर 
न देख छूटता 
किनारा,
कुछ पाने के लिए ज़िन्दगी में, बहुत 
कुछ, खोना भी है लाज़िम, 

* * 
- शांतनु सान्याल 
http://sanyalsduniya2.blogspot.in/
Flowers-in-a-Vase1-artist-Paul-Cezanne