Tuesday, 13 May 2014

सराब ए ख़्वाहिश - -

तलाश करते रहे ख़ुशियाँ न जाने -
कहाँ कहाँ, अंदरुनी अँधेरा रहा
बरक़रार हमेशा की
तरह, कभी
ज़मीं
की तरफ़, कभी आसमां की जानिब,
भटकती रही ज़िन्दगी किसी
प्यासी रूह की तरह,
इक पोशीदा
जुनूं
ही था मेरे वजूद में छाया हुआ, न -
मिल पाया सुकून मुझ को
कहीं दो पल, जबकि
हर चीज़ थी दर
मुक़ाबिल
मेरे
बाहें फैलाए, दरअसल ये सराब ए
ख़्वाहिश थी जिसने, उम्र भर
मुझ को इक मुश्त
सांस लेने
न दिया,
लाख चाहा मगर पुरअमन मुझ को
उसने जीने न दिया।

* *
- शांतनु सान्याल 

पुरअमन - शांतिपूर्ण
इक मुश्त - मुट्ठी भर
पोशीदा जुनूं - अदृश्य पागलपन
सराब ए ख़्वाहिश - चाहत की मृगतृष्णा
http://sanyalsduniya2.blogspot.in/
beauty of roses