Tuesday, 8 April 2014

महकते ख्वाब - -

रख जाओ कभी, कुछ महकते ख्वाब, 
दिल के क़रीब, मुद्दतों से खुली हैं 
चाहतों की खिड़कियाँ, 
न उड़ जाए कहीं 
तेज़ हवाओं 
में यूँ ही 
ख़ुश्बू ए जुनूं, हैं बेक़रार सी आजकल  
अहसासों की तितलियाँ, कहाँ 
रोके रुकती है मौसम 
ए बहार, चले भी 
आओ दिल 
की पनाहगाह में, उफ़क़ पार कौंधती -
हैं फिर कहीं बादलों में रह रह 
के बिजलियाँ - - 

* * 
- शांतनु सान्याल 
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
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