Monday, 21 April 2014

अस्थायी संधि - -

कुछ भी नहीं इस जहाँ में पायदार,
ताश के पत्तों से बने हैं तमाम 
मंज़िलें, इक हलकी सी 
हवा काफ़ी है सब 
कुछ बिखरने 
के लिए, 
फिर न जाने कहाँ है मुश्किल जो 
तुझे रात भर सोने नहीं देती, 
आईना से यूँ शिकायत 
ठीक नहीं, शफ़ाफ़ 
दिल है 
काफ़ी तेरे सँवरने के लिए, क्यों -
इतना है तू दीवाना रंग 
ओ नूर के पीछे,
ज़ख़्मी 
जिगर में मेरे, है नशा काफ़ी बिन 
पिए यूँ ही बहकने के लिए !

* * 
- शांतनु सान्याल 




http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
fragrant breeze