Monday, 10 March 2014

जा रहे जाने कहाँ - -

मुख़्तसर ज़िन्दगी और चाहतें -
बेइंतहा, उभरते हुए 
ग़ुबार के बादल 
दूर दूर 
तक,
भटकती रूह तलाशे मंज़िल का 
निशां, हर सांस बोझिल, 
हर चेहरा लगे 
बेचैन, 
जर्द चाँदनी, फीका फीका सा - -
आसमां, सहमी सहमी
सी हैं दर्द ए 
परछाइयाँ !
जाना था और कहीं, जा रहे जाने 
कहाँ, किस मोड़ पे छोड़ 
आए दिल वाबस्तगी,
जाने कहाँ छूटा 
तेरे इश्क़ का 
कारवां,

* * 
- शांतनु सान्याल 

http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
delicate feeling