Friday, 7 March 2014

तमाशबीन चेहरे - -

उस भीड़ में तुम भी थे शामिल,
अब न पूछो किसने किया 
था, मुझे लहूलुहान 
पहले, उन 
पत्थरों 
में न था किसी का नाम खुदा -
हुआ, तमाशबीन और 
गुनाहगारों में फ़र्क़ 
था बहुत 
कम,
अलफ़ाज़ अपनी जगह लेकिन 
हिस्सेदारी कम न थी,
ख़ामोश ज़ुल्म 
को देखना 
भी है 
ख़ुद से दग़ाबाज़ी, ग़र ज़मीर -
हो ज़िंदा, सिर्फ़ तनक़ीद 
नहीं काफ़ी इंक़लाब 
ए ज़िन्दगी 
में - - 

* * 
- शांतनु सान्याल 


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