Sunday, 16 March 2014

शहर ए जज़्बात - -

बहोत नज़दीक से गुज़री तो है 
बाद ए सबा, फिर भी न 
जाने क्यूँ दिल में 
सुलगते से 
हैं अरमां,
इक पुरअसरार सूनापन रहा -
उम्र भर उसे खोने के बाद, 
जब कभी वो मिला, 
बहोत बुझा 
बुझा 
सा लगा, न जाने क्यूँ वो चाह 
कर भी किसी और का न 
हो सका, वो कोई 
दिल फ़रेब 
बुत 
था या बहोत नाज़ुक था मेरा 
ईमान, लाख कोशिशों 
के बाद, न जाने 
क्यूँ दिल 
उसे 
भूला न सका, वीरान शहर ए 
जज़्बात, दोबारा कभी 
बसा न सका.

* * 
- शांतनु सान्याल 

http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
blooming reflection