Wednesday, 12 March 2014

नायाब शै - -

ग़र हर चीज़ मिल जाए दहलीज़ पे,
ज़िन्दगी का मज़ा हो जाए
बेमानी, तक़दीर का
शुक्रिया, कि
उसने
दी है सौगात ए गुल, काँटों के साथ,
अंतहीन चाहतों की फ़ेहरिस्त,
और किसी इक कोने
में तलाशती
दिल की
ख़ुशी, कैसे समझाए ऐ दोस्त, कि
ये मेरी मंज़िल नहीं, वो इश्क़
जो कर जाए सुलगते
रूह को भी
पुरनम,
आसां नहीं, उस नायाब शै को यूँ
खोज पाना - -

* *
- शांतनु सान्याल

http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
art by svetlana novikova