Thursday, 13 March 2014

ख्वाबों के क़ाफ़िले - -

कहाँ रुकते हैं रोके ख्वाबों के क़ाफ़िले,
वक़्त मिटाता रहा इश्क़ ए निशां,
रेत पर मुसलसल, कहाँ 
मिटते हैं लेकिन 
निगाहों के 
सिलसिले, हो कोई मौज ए दरिया या 
तूफ़ान दीवाना, हर हाल में 
ख़ामोश साहिल 
देखता है 
समन्दर के मरहले, हर दौर का होता 
है अपना अलग इन्क़लाब,
अँधेरा घिरते कोई 
चिराग़ ए शाम 
जले या 
न जले, कहाँ रुकते हैं रोके ख्वाबों के 
क़ाफ़िले,

* * 
- शांतनु सान्याल 
मरहले - क़दम, चरण  
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
art by k. juric