Sunday, 9 February 2014

कोई और न था - -

वो शख़्स कोई और न था मेरे अक्स 
के सिवा, छलता रहा मुझे ही 
ओ रात दिन, मेरे ही 
अंदर रह कर, वो 
आत्म दहन 
था कोई,
या ज़रूरत से कहीं ज्यादा पाने की -
ख्वाहिश, कहना है बहोत 
मुश्किल, दरअसल 
कई बार हम 
जानबूझ 
करते हैं ख़ुद से फ़रेब, और ढूंढ़ते हैं 
इक अदद मासूम चेहरा, 
इल्ज़ाम के लिए, 
मैंने ख़ुद ही 
चुनी थी 
राह अपनी, मंज़िल ग़र नज़र न -
तो इसमें रहनुमा आसमां 
का आख़िर क़सूर
कैसा, उसने 
तो खुला रखा था रात भर, उजालों 
भरा शामियाना - - 

* * 

- शांतनु सान्याल 

http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
art by Ryu Eunja