Saturday, 8 February 2014

मुंतज़िर साँसें - -

उस मोड़ पे अब तलक हैं बिखरे 
गुलमोहरी यादों के निशां, 
कुछ मुस्कुराहटों के 
ख़ुश्बू, और 
एक 
मुश्त खुला आसमां, तलाशती -
हैं बेचैन निगाहें उजली 
रातों की कहानियां, 
कुछ तुम्हारे इश्क़ 
का वहम, 
कुछ 
मेरी रूह की परछाइयां, न जाने
किस जानिब तुम गए मुड़,
न जाने किस ओर थी 
मेरी मंज़िल, आज 
भी हैं मुंतज़िर 
मेरी साँसें, 
आज 
भी है बेक़रार, तुम्हारे लिए मेरा 
दिल - - 

* * 
- शांतनु सान्याल 
मुंतज़िर - इंतज़ार में 
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
 art by norma wilson