Monday, 3 February 2014

ज़िन्दगी की राहें - -

न खेल यूँ आतिश ए जज़्बात से - 
मेरे, झुलस न रह जाए कहीं 
उभरते बर्ग मुहोब्बत, 
अभी तलक 
तुमने 
देखा कहाँ है चमन का मुक्कमल 
संवरना, सूरज की पहली -
किरण में फूलों का 
हौले हौले से 
खिलना,
अभी अभी तो ढली है ख़ुमार ए -
शब, कुछ और रौशनी बिखरे 
वादियों में, अभी तलक 
है तुम्हारे दिल में 
शबनमी 
छुअन बाक़ी, न देख यूँ नींद भरी 
आँखों से हक़ीक़ी दुनिया,
कि आसां नहीं है 
ख्वाबो से
यकायक उभरना, ज़िन्दगी की -
राहें हैं बहोत मुश्किल 
लेकिन हसीन भी 
कम नहीं।

* * 
- शांतनु सान्याल 

http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
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