Sunday, 23 February 2014

जज़्बा ए इश्क़ - -

जिस्म से लम्बी परछाइयाँ, बढ़ा 
जाती हैं अक्सर, शाम ढलते
कुछ ज़ियादा ही, दिल 
की परेशानियाँ,
इंतज़ार 
कोई जो गहरा जाए मज़ीद, रूह 
की तन्हाइयाँ, न ले यूँ 
इम्तहां मेरे सब्र 
का, कि इक 
मुद्दत 
से हूँ मैं मुंतज़िर सुलगने के लिए,
रात ढलने से पहले, न कहीं 
बुझ जाए जज़्बा ए 
इश्क़, कितनी
सदियों 
से है बेक़रार ये ज़िन्दगी पिघलने 
के लिए - - 

* * 
- शांतनु सान्याल  
 http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
art by barbara palmer