Saturday, 25 January 2014

तूफ़ान ए इन्क़लाब - -

न जाने कहाँ है वो सुबह ख़ुशगवार, 
जिसे पाने की चाहत में उम्र 
गुज़र गई, न जाने ये 
कैसा है कोहराम, 
फिर किसी 
ने दी 
है, भीड़ चीरकर दर्द भरी चीत्कार -
ये कैसा है जश्न तेरी महफ़िल 
में मुदीर ए जमुरियत,
दर नज़दीक ए 
क़िला,
गूंजती हैं दबे कुचलों की पुकार और 
अब तलक है तू अनजान, कहीं 
ये अनसुनापन न कर 
जाए तुझे तबाह 
हमेशा के 
लिए 
कि फिर उफ़क़ पे उभरने लगा है - -
तूफ़ान ए इन्क़लाब - - 

* * 
- शांतनु सान्याल 
अर्थ 
जमुरियत - लोकतंत्र 
मुदीर - दिग्दर्शक 
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
stormy moonlight