Tuesday, 21 January 2014

लम्हा लम्हा जलते बुझते रहे - -

इक बेइन्तहा गहराई सामने, या 
उसका पुरअसरार निगाहों 
से देखना, तमाम रात
ज़िन्दगी, डूबती 
उभरती 
रही, 
किसी शिकस्ता हाल कश्ती की 
तरह, मौज ए समंदर या 
अंधेरों के साए, किसी 
ने भी न की हमसे 
सुलहनामे 
की बात,
हर 
कोई था तमाशबीन, संग ए - - -
साहिल की तरह, रात 
भर गिरती रही 
शबनम या 
क़तरा 
ए आतिश, हमें कुछ भी अहसास 
नहीं, किसी के इश्क़ में हम 
यूँ ही लम्हा लम्हा 
जलते बुझते 
रहे - - 

* * 
- शांतनु सान्याल  
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
moonlight beauty