Thursday, 30 January 2014

बेइंतहा मुहोब्बत - -

इस क़दर बेइंतहा तेरी मुहोब्बत, 
न कर जाए मुझ से जुदा 
मेरी हस्ती, न भूल 
जाऊं मैं कहीं, 
तमाम 
आलम ओ वजूद तेरी निगाह के 
सामने, न बना मुझको 
यूँ ज़र्रे से आसमां,
कि बिखरने 
के बाद न 
ढूंढ़ 
पाऊँ कहीं नाम ओ निशां अपना,
रहने दे मुझे यूँ ही ग़ैर महसूस, 
ज़ेर साया तेरी आँखों में 
कहीं, कि ग़र टूट 
जाऊं कभी 
तो - - 
मिल जाए मुझे पनाह, कूचा ए -
दिल में तेरे कहीं न कहीं !

* * 
- शांतनु सान्याल  - 

http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
arrt by loren elizabeth conley