Saturday, 25 January 2014

तलाश - -

कहाँ मिलती है हर चीज़, ज़िन्दगी में 
मुताबिक़ दिल के, कुछ न कुछ 
समझौता है, ज़रूरी जीने 
के लिए, न रख 
सीने में 
तलब, यूँ तस्सवुर से ज़ियादा, कि - -
टूटने के बाद, न चुभे कहीं 
ख्वाबों के टुकड़े, 
तमाम उम्र 
जिसे 
तलाश की हमने बुतों की भीड़ में, वो 
शख्स था, न जाने कब से मेरे 
तहे दिल में पिन्हाँ, उस 
की निगाहों में है 
इक अजब 
सी - - 
चमक आजकल, शायद उसने देखा - -
है बेदाग़ आईना, इक मुद्दत के 
बाद - - 

* * 
- शांतनु सान्याल 
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
art by filomena booth