Wednesday, 22 January 2014

किसे ख़बर फिर मिलें न मिलें - -

किसे ख़बर फिर मिलें न मिलें, जो 
पल हैं, अपने दर मुक़ाबिल,
क्यूँ न जी लें उन पलों 
में उम्र से लम्बी 
ज़िन्दगी 
अपनी, यूँ तो ख्वाहिशों का कोई -
इख़त्ताम नहीं, फिर भी 
इन लम्हों में क्यूँ न 
सजा लें अनदेखे 
ख्वाबों के 
दरीचे,
वो दर्द जो अश्क से मोती न बन
पाएं कभी ,उन्हें ज़मीं दोज़ 
करना है बेहतर, कोई 
साथ नहीं चलता 
उम्र भर के 
लिए,
जो वस्त राह साथ छोड़ जाए उसे 
वक़्त रहते भूल जाना ही है 
अक़लमंदी ! 

* * 
- शांतनु सान्याल 
अर्थ - 
इख़त्ताम - अंत 
ज़मीं दोज़ - ज़मीं के निचे 
वस्त - मध्य 

http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
art by nancy madina