Sunday, 29 September 2013

दिल से हमने भुला दिया - -

ज़रा सी धूप की ख़्वाहिश थी मेरी, उसने -
तो वजूद ही झुलसा दिया, न जाने 
उसकी नज़र में मुहोब्बत के 
मानी क्या थे, जिस्म 
तो है नापायदार 
इक महल,
उसने 
तो रूह तक हिला दिया, अब कोई न पूछे 
अफ़साना ए ज़िन्दगी मेरी, हमने 
अपने ही हाथों, वो तमाम 
उभरते ख़्वाबों को 
जला दिया,
न देख 
फिर मुझे हसरत भरी नज़र से यूँ, जा -
तुझे दिल से हमने भुला दिया - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 


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painting by artist Marina Petro 2

Saturday, 28 September 2013

आग़ाज़ सफ़र - -

कुछ यादें जो चुभती हैं कांटों की तरह,
उन्हें वक़्त रहते निकाल फेंकना 
है बेहतर, नासूर न हो जाए 
कहीं दर्द ए जिगर
मेरा, वो 
राह 
जो ख़ुद में ही हो उलझा हुआ, रात - - 
गहराने से पहले उसे भूलना है 
बेहतर, हर क़दम पे 
ज़िन्दगी लेती 
है इम्तहां,
और 
दे जाती है हर बार सबक़ नया, गिरह 
जो न खुल पाए वक़्त रहते उसे 
तोड़ना है बेहतर, न तू ही 
है कोई सिकंदर, न 
ही मेरी मंज़िल 
आख़िर,
यहीं से है मेरा आग़ाज़ सफ़र, अब जो 
भी हो आगे, देखा जाएगा - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 
 आग़ाज़ सफ़र - यात्रा की शुरुआत 


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painting by artist Jacqueline Gnott 1

Thursday, 26 September 2013

ख़्वाबों के परिंदे - -

किस तरह समझाएं उन्हें, हँसने की चाह 
में, आंसुओं ने अक्सर अपना 
वादा तोड़ दिया, हमने 
समझाया लाख 
मगर 
ज़िन्दगी ने हर क़दम पे ग़मों से नाता - -
जोड़ दिया, तुम्हारी ख़्वाहिशों की 
सतह थी, शायद आसमां 
से कहीं ऊपर, कुछ 
दूर तक तो 
उड़े 
मेरे ख़्वाबों के परिंदे, थक हार के आख़िर 
हमने भी, मजरूह ए वजूद का रूख़ 
मोड़ दिया, ये कम तो नहीं 
कि तुम्हारी निगाहों 
में अब  तलक 
हैं रौशन 
मेरी 
मुहोब्बत के चिराग़, इसलिए आजकल 
हमने अंधेरों से डरना छोड़ दिया,
किस तरह समझाएं उन्हें,
हँसने की चाह में, 
आंसुओं ने 
अक्सर 
अपना वादा तोड़ दिया - - - - - - - - - - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 
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oil painting candle light flower by nora macphail

Wednesday, 25 September 2013

आँखों के तह में - -

इन आँखों के तह में छुपे हैं कितने बरसात 
शायद तुम्हें ख़बर नहीं, तुम कभी 
पल भर के लिए, मेरी नज़र 
से सुलगता जहां 
तो देखो,  
इस दिल की नाज़ुक धड़कनों में हैं न जाने 
कितने ही टूटे शीशमहल, शायद 
तुम्हें ख़बर नहीं, तुम किसी 
दिन के लिए, मेरे 
जज़्बात का 
का यूँ 
पिघलता आसमां तो देखो, तुम्हारी अपनी
दुनिया है ख़ुशबुओं से लबरेज़, कभी 
वक़्त ग़र मिले, मेरे दर्द का 
दूर तक बिखरता
कारवाँ तो 
देखो,
मेरी नज़र से सुलगता जहां तो देखो - - - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 
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warning fires - - unknown art

Monday, 16 September 2013

मृगतृष्णा या कुछ और - -

ये कैसी अनुभूति है जो खींचे जाए अनजानी 
राहों पर, न ज़मीं का अपनापन, न ही 
फ़लक की उदारता, बढ़े जा रहे 
हैं क़दम न जाने किन 
मंज़िलों की ओर,
ये कैसा 
सूनापन है ज़िन्दगी में, सजी हुई हैं ख़्वाबों 
की दुनिया, फिर भी आँखों में है क्यों 
अधूरापन, न तुम्हारे वादों 
का ऐतबार, न अपनी 
तस्मीम पर है 
भरोसा,
दूर तक हद ए निगाह बरस रहे है बादल -
फिर भी दिल की ज़मीं है गिरफ़्त 
ए बियाबां, न कोई क़रीब, 
न ही कोई दूर, इक 
ख़ामोशी है 
जो कहना चाहती है बहोत कुछ, लेकिन - -  
अफ़सोस, सुनने वाला मेरे हम -
क़दम कोई नहीं - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 

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desert beauty 

Sunday, 15 September 2013

अंदरूनी कोहरा - -

हासिल चाहे जो भी हो ज़िन्दगी में कुछ 
भी फ़िक़्र नहीं, ये कम तो नहीं कि 
मुस्कुराना तो हमें आ ही 
गया, जब कभी 
दर्द बढ़ा 
दिल में हमने इंतज़ार किया बारिश का,
इक शिद्दत से थी आँखों को 
शिकायत हमसे, चलो 
अच्छा ही हुआ 
आंसू छुपाना 
तो हमें  
आ ही गया, मेरी पलकों में तुम न ढूँढ - 
पाओगे एक भी अश्क क़तरा,
ये राज़ ए बरसात है 
दिल के दाग़ 
बहाना 
तो हमें आ ही गया, ये और बात है, कि 
भीगे जिस्म के अन्दर है सुलगता 
आतीशफ़िशां कोई, फिर भी 
अंदरूनी कोहरा दबाना 
तो हमें आ ही 
गया - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 
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chinese painting traditional 1

Saturday, 14 September 2013

हमने भी आख़िर सीख लिया - -

ज़िन्दगी जीने का सलीका हमने भी आख़िर 
सीख लिया, काँटों से दामन बचाने 
का तरीक़ा हमने भी आख़िर 
सीख लिया, वो ज़ख्म 
जो दिल की 
गहराइयों में थे कहीं सहमें सहमें, उन्हीं - - 
ज़ख्मों से इल्म इलाज बनाना 
हमने भी आख़िर सीख 
लिया, हमें मालूम 
है रस्म ए 
दुनिया 
अच्छी तरह, कोई नहीं जो निभा जाए अहद 
उम्र भर के लिए, ख़्वाबों से निकल 
रेगिस्तां में जीना हमने भी 
आख़िर सीख लिया, 
तुम्हारे लब 
ओ रूह 
के बीच थे सदियों के फ़ासले, दर्रों के बीच - - 
ख़ुद को बचाए निकलना हमने भी 
आख़िर सीख लिया - - 
* * 
-  शांतनु सान्याल 
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healing-light - - art by marina petro 

Thursday, 12 September 2013

कुछ लम्हों की कहानी - -

कभी सोचा ही नहीं तुम्हारे बग़ैर ज़िन्दगी के 
मानी, ये सच है लेकिन हर चीज़ यहाँ 
है बस कुछ लम्हों की कहानी, 
फिर मेरी जगह ले 
लेगा कोई,
ये धुंध नहीं अविराम स्थायी, घाटियों में - -
पुनः खिलेंगे बुरुंश के फूल, दूर 
दूर तक गूंजेंगी गुंजन 
जानी पहचानी,
कहाँ रुकता 
रोके वक़्त का क़ाफ़िला, इक बहता स्रोत है 
ये भावनाओं का निरंतर, कोई किसी 
के लिए नहीं करता इंतज़ार 
उम्रभर, पलक झपकते 
ही सब कुछ हो 
जाए गुम,
जो नज़र के सामने हो, वही इक शाश्वत 
सत्य है ओझल होते ही सभी बातें
हो जाएँ पुरानी - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 

Wednesday, 11 September 2013

समीकरण ज़िन्दगी का - -

समीकरण ज़िन्दगी का आसां नहीं सुलझाना,
तमाम योग वियोग के बाद भी ज़रूरी 
नहीं, अंत में शून्य आना, नियति 
का अंकगणित है बहोत 
ही जटिल, सहज 
कहाँ सपनों 
का 
साकार होना, उनके सभी भविष्यवाणियाँ - -
रहे धरे के धरे, मस्तक की रेखाओं 
से है मुश्किल लड़ पाना, मझ -
धार की लहरों से निकल 
तो आई नैय्या, 
अद्भुत 
था उसका किनारे से लग डूब जाना, दूर तक 
गूंजती रही उसकी गुहार, सांध्य 
आरती के मध्य किसी ने 
भी न सुनी उसकी 
पुकार, डोलती 
नौका 
बता न पायी उसका ठिकाना, समीकरण - - 
ज़िन्दगी का आसां नहीं सुलझाना,
* * 
- शांतनु सान्याल 
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art by elena balekha

Tuesday, 10 September 2013

प्रीत रुपी तुहिन जल - -

कभी अंतर्मन से तो फूटे सत्य जल स्रोत,
किसी शुष्क नेत्र में तो जगे जीवन 
बीज, कभी अहम् ब्रह्मास्मि
का चक्रव्यूह तो टूटे !
वक्षस्थल से 
उभरे 
अनमोल भावनाओं के खनिज, हर एक 
सांस में है छुपा सुरभित संवेदन,
ज़रूरत है सिर्फ़ एक गहन 
आत्म विश्लेषण,
कभी ह्रदय 
झील 
में तो जागे मानवता का शतदल, लिए 
पंखुड़ियों में प्रीत रुपी तुहिन जल।
* * 
- शांतनु सान्याल 

Saturday, 7 September 2013

तलाश - -

सफ़र ज़िन्दगी का रुकता नहीं कभी, कोई 
इंतज़ार करे या न करे, हर सांस 
को है इक मंज़िल की 
तलाश, धुंध 
भरे 
रास्ते या हों वीरान मरू प्रांतर, स्वप्नील 
अंधकार या हों चाँद रात, हर हाल 
में ज़िन्दगी को है इक 
मंज़िल की 
तलाश, 
उनकी तजवीज़ों में है कितना अपनापन !
सोचेंगे कभी फ़ुरसत में हम, अभी 
तो जी लें अपनी तरह, अभी 
तो है दिल को वाज़ी 
इक मंज़िल 
की 
तलाश, दूर हो या आसपास हर सांस को है 
इक मंज़िल की तलाश - - 
* * 
- शांतनु सान्याल

तजवीज़ - सुझाव 
वाज़ी - स्पष्ट 


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painting by artist Karen Margulis

Wednesday, 4 September 2013

सनम आतीश - -

न बुझे लौ, दिल की गहराइयों से उठता हुआ,
आँधियों की मजबूरियां रहे, अपनी 
जगह, सहरा ही सही मेरी 
क़िस्मत, तेरी 
निगाहों 
की परछाइयाँ रहे अपनी जगह, मैं उभर तो 
जाऊं बेचैन मौज ए दरिया से, दिल 
की रौशन बस्तियां रहे, अपनी 
जगह, इक गुमशुदा 
किनारा है - 
कहीं, तेरे लरज़ते लब के दरमियां, ख़ामोश 
लफ़्ज़ों की परेशानियाँ रहे, अपनी 
जगह, तू है कोई  मुजस्मा 
जादुई, या सनम 
आतीश !
अहतराक़ महताबी है मेरा इश्क़ कोई, - - 
गुलाबी आग में जलती तन्हाइयां -
रहे, अपनी जगह - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 

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art by barbara fox 2
अहतराक़ महताबी- चांदनी का दहन 
मुजस्मा  - मूर्ति 

Tuesday, 3 September 2013

अनबुझ क़रारदार - -

न जाने है ये कैसी दिलबस्तगी, मैं नहीं मेरे 
अन्दर, कोई और सांस लेता नज़र 
आए, इक तरफ़ है रस्म 
जहान और दूसरी 
जानिब 
तक़ाज़ा इश्क़ अंतहीन, किधर का रुख़ करे 
कोई, हर सिम्त इक उसी का चेहरा 
उभरता नज़र आए, उसकी 
शर्तों में हैं शामिल 
तज़दीद -
हयात तक का, इक अनबुझ क़रारदार - - 
कैसे समझाए कोई उनको, दूर तक 
है अँधेरा घना, और ये वजूद 
फ़ानी, दुनिया ए सिफ़र 
में डूबता नज़र 
आए - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 
तज़दीद - हयात - पुनर्जन्म  
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art by robert burridge 

Monday, 2 September 2013

ख़बर ही नहीं - -

उन्हें ख़बर ही नहीं, और हम दुनिया भुला बैठे, 
वो हैं मशग़ूल कुछ यूँ अपने ही दायरे में 
सिमटे हुए, और हम सब कुछ 
भूल, उनको अपना बना 
बैठे, न जाने कहाँ 
किस दरिया 
के सीने 
में है डूबा सूरज, फ़िज़ा में है इक तैरता अँधेरा
बेइन्तहा, शाम तक तो सब कुछ ठीक 
ही था, उसके बाद न जाने क्या 
दिल में रोग लगा बैठे, 
अभी तो है रात 
का इक 
लम्बा सफ़र बाक़ी, अभी अभी आँखों में उभरे 
हैं कुछ ख़्वाबों के जुगनू, अभी अभी 
साँसों में जगे हैं कुछ भीगे से 
ख़ुशबू, न जाने ये 
कैसा तिलिस्म 
है उनकी 
चाहत का, जिस्म तो सिर्फ़ जिस्म है इक शै 
फ़ानी, जुनूं देखें कि हम रूह तक भुला 
बैठे, उन्हें ख़बर ही नहीं, और 
हम दुनिया भुला बैठे - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 
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unknown art source 5