Saturday, 24 August 2013

अहसास ख़ालिस - -

वो अहसास ख़ालिस जिसमें हो शामिल इश्क़ 
आलमगीर, रंग रूप नश्ल के तफ़ावत 
से जुदा, इक ऐसा फ़लसफ़ा ए 
ज़िन्दगी, जिसमें हर 
चेहरा लगे,
खिलता हुआ गुल ताज़ा, हर नफ़्स में उभरे -
ख़ुशबू ए इंसानियत, वगरना बेमानी 
हैं सभी तामीर ए ज़ियारत -
गाह, अक्स ख़ुदा होता 
नहीं है शामिल,
अगर - - 
दस्त दुआ न हो सफ़ाफ़ दिल वाला - - - - - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 

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rare flower - -

Sunday, 18 August 2013

बर्ग ए अफ़साने नज़र आए - -

न जाने क्या थीं मजबूरियां उनकी,
मिला के नज़र आशना, वो 
बहोत बेगाने से नज़र 
आए, यूँ मुड़ गए 
पलक - 
झपकते रौशनी छू कर,अपनी ही 
परछाइयों से वो बहोत -
अनजाने नज़र 
आए, 
तलाश करते रहे जिन्हें उजाले ओ 
अंधेरों के दरमियां, वो चेहरे 
मुखौटों वाले, नज़दीक 
से बहोत जाने 
पहचाने 
नज़र आए, बहोत दिलकश थे वो 
दूर के मंज़र, आबशारों में 
नहाए हुए, खिलते 
हुए गुलों से 
लबरेज़ 
वादियाँ, क़रीब पहुँचते ही वो सभी 
बर्ग ए अफ़साने नज़र आए,
मिला के नज़र आशना,
वो बहोत बेगाने 
से नज़र 
आए,
* * 
- शांतनु सान्याल 

बर्ग - पत्ते 
आशना - परिचित
आबशार - झरना  
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art by poggy garr

Saturday, 17 August 2013

शोला ए जुनूं - -

वीरान दिल में है जगह बेशुमार, कभी बसने 
की ख़्वाहिश तो जागे, हम हैं पलक 
बिछाए मुद्दतों से, इक शोला 
ए जुनूं लिए सीने में, 
उनके दिल में 
कभी, -
कहीं से, इक फ़न ए आज़माइश तो जागे, न 
पूछ मेरी दीवानगी का आलम, हर 
शै कर जाएं क़ुर्बान, शर्त 
बस इतनी है कि 
उनके दिल 
में इक 
शदीद फ़रमाइश तो जागे, वीरान दिल में है - 
जगह बेशुमार, कभी बसने की ख़्वाहिश 
तो जागे - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 
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paintings-xie-ming-chang

Thursday, 15 August 2013

मिलो इस तरह - -

फिर मिलो इस तरह कि दरमियां अपने 
कोई ख़ालीपन न रहे बाक़ी, हो सिर्फ़ 
निगाहों से इक पुर ख़ामोश 
मुबादला ए जज़्बात, 
सांसों से हो 
राब्ता
इस क़दर, कोई अपनापन न रहे बाक़ी !
ज़माने की नज़र में उठे है फिर 
तलातुम कोई, या इश्क़ 
का है आलमी 
असर,
तुम बरसो सावन की मानिंद बेलगाम 
इस तरह कि दिल में कोई -
ख़लिश, बंजारापन 
न रहे बाक़ी,
खिलो 
तो सही काँटों से उभर कर इक बार यूँ  - 
कि तासीर दर्द बदल जाए - - 
* * 
- शांतनु सान्याल

मुबादला - विनिमय
तलातुम - बेचैनी 

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PAINTING BY BARBARA FOX

आज़ादी का जश्न - -

आज़ादी का जश्न हर तरफ़, ज़मीं ओ 
आसमां सब उनकी मिल्कियत,
उस मोड़ पे है खड़ी बेलिबास, 
ख़ामोश, नफ़स दर 
नफ़स भटकती 
ये ज़िन्दगी, 
वो -
जलाएं चिराग़ जहाँ जी चाहे, बाम हो 
दहलीज़, कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता,
उनका फ़ैसला है उनकी 
तबीयत, ज़मीं ओ 
आसमां सब 
उनकी 
मिल्कियत ! मुझे मालूम है बेनक़ाब 
चेहरे की मुहोब्बत, चिराग़ 
बुझते ही वो नज़र 
आयेंगे, फिर 
शक्ल ए 
शिकारी यकसां, बचपन से बुढ़ापे तक 
देखा मैंने, उन्हें बहोत क़रीब से,
सब तरफ हैं मोहरे उनके,
हर मोड़ पे हैं मौजूद 
उनके निगहबां,
जानते हैं 
सब उनकी नेकदिली, कितनी पाक है 
उनकी नियत, ज़मीं ओ आसमां 
सब उनकी मिल्कियत - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 
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 painting by ARUP LODH - KOLKATA - INDIA

Tuesday, 13 August 2013

वहम रंगीन - -

है अँधेरा घिरता हुआ, दम ब दम हो चले 
तुम, मेरी ज़ात पे यूँ क़ाबिज़, 
कि छूट चली है दूर 
ये ज़मीं, और 
आसमां 
नज़र आए कोई वहम रंगीन ! फिर है -
तलाश किसी नूर मसीहाई का, 
ये कैसा माहौल ए जुनूं 
है कि तेरे इश्क़ में,
भूल सा चला 
है वजूद,
सारी कायनात ! ये कैसा असर है तेरी 
चश्म किमियाई का, इक अजीब 
सा अहसास ए नशा है हर 
सिम्त, दम ब दम 
ज़िन्दगी 
खींचे जा रही है, जाने किस सम्मोहन - 
की जानिब, तोड़ भी दे कोई ये 
ख़्वाब मेरा बिखरने से 
पहले, कि वास्ता 
है तुम्हें 
सिर्फ़ इक पोशीदा ख़ुदाई का - - - - - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 

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art by Marina Petro 1

Monday, 12 August 2013

मैं वो नहीं - -

जाने क्या चाहता है वो शख़्स मुझसे, अक्सर 
होता है दर मुक़ाबिल, दहलीज़ में खड़ा 
तनहा, लिए हाथों में इक -
आदमक़द आईना !
फिर मैं तलाश 
करता हूँ 
उसे दिखाने को इक नया चेहरा, इस रोज़मर्रा 
की तकरार ने मुझे बना रखा है, इक 
ख़ूबसूरत मोहरा, हर क़दम पे 
मैं दे जाता हूँ ज़िन्दगी 
को यूँ फ़रेब, 
असल 
में किसी ने भी मुझे आज तक नहीं देखा - -
बेनक़ाब ! मैं हूँ इक रूह ए इंसान 
मामूली, भीड़ में दबा हुआ 
नुक्कड़ में कुचला 
हुआ, सीलन 
भरी -
दीवारों से रिसता हुआ, तंग गलियों में तनहा 
खांसता हुआ, फुटपाथ के ऊपर चाक 
से उभरे, गुमनाम तस्वीरों में 
अपना वजूद तलाश 
करता, चंद 
सिक्कों 
में कहीं अपनी ज़िन्दगी खोजता हुआ, उसे - - 
कैसे समझाऊं मैं वो नहीं, जिससे 
उसे मुहोब्बत है - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 
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art by Partha Bhattacharya

Sunday, 11 August 2013

आख़री पहर - -

साअत गुज़िश्ता तुम थे, जिस्म ओ जां -
पे छाए, किसी शब ए गुल की 
मानिंद, सदा बहार कोई 
ख़ुशबू ! जाती नहीं 
ख़ुमारी अब 
तलक,
दिल ओ ज़ेहन से, जबकि दिन ढलने को 
है कुछ लम्हा बाक़ी, फिर तेरा 
इंतज़ार भर चला है - 
पुराने ज़ख्म 
धीरे धीरे, 
फिर जलने की ख़्वाहिश लिए ज़िंदगी - -
तकती है बुझे चिराग़ की जानिब,
फिर चाहता है दिल तुझे
अहसास करना 
रूह ए 
गहराई तक, फिर निगाहों की चांदनी में 
बिखरने की आरज़ू है कहीं -
बेक़रार ज़िन्दगी 
को - - 
* * 
- शांतनु सान्याल

साअत गुज़िश्ता- आखरी पहर 
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paintings-by-marney-ward

बहोत दूर कहीं - -

बेख़्वाब मेरी आँखें और तुम नज़र आए -
बहोत दूर, जा रहे हो अजनबी की 
तरह, सब कुछ समेटे अपने 
पहलू में आहिस्ता -
आहिस्ता,
न कहा ख़ुदा हाफ़िज़, न फिर मिलने का 
झूठा ही कोई वादा, हमने देखा है -
तुम्हें, लिए दिल में एक 
हसरत, उदास 
बियाबां - 
ज़मीं की तरह, जा रहे हो तुम न जाने -
किस जानिब, कल रात अब्र क़तअ, 
शीशे की मानिंद ! सब कुछ 
समेटे अपने पहलू में 
अहिस्ता - 
आहिस्ता, देखा है कल रात तुम्हें कुछ -
यूँ बेनज़ीर, अंदाज़ ए मबहम, 
जा रहे हो तुम निकल 
मेरी साँसों से 
इक -
मुश्त, हसीं ज़िन्दगी की तरह, बहोत - -
दूर तुम नज़र आए ख़लाओं में 
गुम, लम्हा लम्हा इक 
अनबुझ तिश्नगी 
की तरह,  
बेख़्वाब मेरी आँखें और तुम नज़र आए -
बहोत दूर, जा रहे हो अजनबी की 
तरह - - 
* * 
- शांतनु सान्याल
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art by - ASHLEY BERRY 

Saturday, 10 August 2013

पूर्व अग्नि स्नान - -

अदृश्य, असीम, वो दिव्य आलोक जो 
भर जाए अंतर्मन की अथाह -
गहराई, फिर उदित 
हो तमस 
भेद 
सहस्त्र अश्वों के रथ में आसीन, - - 
युगांतकारी सूर्य, लिए देह 
में प्रज्वलित अनल 
शिखा, फिर 
गर्जना 
हो 
अनंत शंख नाद से एक बार, पुनश्च 
हो महोत्सव रिपु दहन का !
पुनः जागे सुप्त धरा 
लिए रक्त में 
बीज,
कुरुक्षेत्र के विस्मृत योद्धाओं का - - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 
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art of Nandalal Bose - India

Friday, 9 August 2013

माया जाल - -

पूर्व ज्ञात था मुझे, तुम चाह कर भी 
माया मुक्त न हो पाओगे !
अदृश्य श्रंखला तुम्हें 
रोकेगी पग पग, 
कुछ दूर जा 
फिर 
उसी बिंदु पर लौट आओगे, नियति 
की अपनी हैं अग्नि रेखाएं,
लाख प्रयास करे कोई 
लांघना है बहुत 
कठिन,
करतल की रेखाएं मिट गईं समय 
के साथ अपने आप, या 
उभरी हैं चेहरे पर 
झुर्रियों में 
बदल 
कर, इस मोड़ पर कुछ भी कहना है 
मुश्किल, तुलसी तले दीप 
जलने से पहले, मुझे 
मालूम है तुम 
लौट 
आओगे, तुम चाह कर भी माया - - 
मुक्त न हो पाओगे - - 
* * 
- शांतनु सान्याल  

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art by - caramen guedez

Thursday, 8 August 2013

उपासना - -

तुम भोर की मख़मली स्वप्न हो !
आँख खुलते ही जो बिखर 
जाए, ओस बूंदों की 
तरह -
अंतःप्रेरणा हो तुम सदैव सुरभित, 
अनंतकालीन रोशन कोई 
नीलाभ नीहारिका,
क्या हो तुम 
क्या -
नहीं, अपरिभाषित कोई दिव्य - -
अनुभूति, शब्दों में जिसे 
ढाला न जा सके 
वो अद्वित्य 
सौन्दर्य 
की कोई कविता हो तुम या कोई 
आत्मलीन शतदल की हो 
कोमल भीगी 
पंखुडियां !
न जाने क्या हो तुम, मरू प्रांतर - - 
भी करें तुम्हारी उपासना !
* * 
- शांतनु सान्याल 

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art of Samir Mondal, Kolkata -India

Saturday, 3 August 2013

शब ए तिलिस्म - -

कोई आहट जो सुनसान राहों से गुज़र कर, -
ख़्वाबों की सीड़ियों से हो कर, दिल 
के दर पे दे जाए इक प्यार 
भरा दस्तक ! उस 
अनजान -
ख़ुशबू की चाहत में ज़िन्दगी, बहोत तनहा -
बहोत मुख़्तसर, बेजान सी नज़र 
आई, फूल खिले और झर 
भी गए, आख़री पहर,
लेकिन वो न आए,
भीगी रात 
बहोत परेशां सी नज़र आई, इक ख़ामोशी -
भटकती रही मंज़िल मंज़िल, इक 
धुंआ सा उठता रहा, वादी 
वादी, अपनी ही -
परछाई 
आज मुझे, बहोत अनजान सी नज़र आई - 
* * 
- शांतनु सान्याल 

midnight street