Sunday, 31 March 2013

रात ढलते - -

मुश्किल इतना भी न था, कि दोबारा न मिलते,
भूल जाने का सबब कुछ और रहा होगा, 
नफ़स में शामिल होने का भरोसा 
न था, इतना भी नाज़ुक,
क़सम लेकर 
मुकर 
जाने का सबब कुछ और रहा होगा, बाख़बर -
हूँ इस आवारगी ए मौसम से, पल में 
धूप खिले, पल में दूर तक हो 
अँधेरा, ये बहाना लेकिन 
क़ाबिल ए ऐतमाद 
नहीं, वादा 
लेकर 
मंज़िल बिसर जाने का सबब कुछ और रहा 
होगा, इक ख़ामोश, निगाह ए क़रार 
था दरमियां अपने, गवाह कोई 
नहीं सिवा तबादिल  
ए साँस के, 
रात ढलते बूंद बूंद शबनमी अहसास में यूँ 
बिखर जाने का सबब कुछ और 
रहा होगा - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 
last night - - 

Thursday, 28 March 2013

अब्र ए ख़ुशबू - -

रूकती कहाँ हैं रोके, उड़ती हुईं  ख़्वाब आलूद 
तितिलियाँ, अपनी हथेलियों में बंद कर 
ले, जुगनू की मानिंद महके हुए 
कुछ मेरे जज़्बात, इक 
लम्स, जो बदल 
जाए मेरी 
ख़ुश्क तक़दीर, ख़ुदा के लिए किसी दिन - - 
इक पल के वास्ते बिखर जा अब्र 
ए ख़ुशबू की तरह - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 

ART BY DAVID JAY SKIPER

Saturday, 23 March 2013

उभरता सितारा - -


वो आज फिर मेरी, अंदरूनी गहराई खंगाल गया,
गोया ख़ामोश ज़मीर पे यूँ सुलगती लौ डाल गया, 

तमाशबीनों की भीड़ में, अपने भी अजनबी लगे,
लड़खड़ाने के पहले, नाआशना कोई संभाल गया,

उस रास्ते की सभी बत्तियां थीं, मुद्दतों से बुझी -
न जाने वो कौन था,जो अंधेरों से यूँ निकाल गया, 

हर एक  की नज़र में था वो इक उभरता सितारा,
आख़िर शब न जाने क्यूँ वो, बहोत बदहाल गया,
* * 
- शांतनु सान्याल 
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/

art by by ~fadmaggot

Sunday, 17 March 2013

तोहफ़ा ए दर्द - -

मेरा दर्द मुझको अज़ीज़ था क्यूँ तुमने 
ख़ुद को शामिल किया, फिर बुझे 
अंगारों को हवा दी, फिर 
इक बार ज़िन्दगी 
को बा सिम्त 
गिरफ़्त ए 
तूफां 
किया, मेरा ज़ब्त इतना ज़हीफ़ न था, 
क्यूँ तुमने फिर शीशा ए शक्ल 
दिया, मैं यूँ ही था अपनी 
दुनिया में खोया 
हुआ, क्यूँ 
तुमने 
मुझसे प्यार किया, क्यूँ तुमने फिर - - 
इक नया तोहफ़ा ए दर्द दिया।
* * 
- शांतनु सान्याल 
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
painting by AMANDA ELLIS 
painting by AMANDA ELLIS 

Wednesday, 13 March 2013

सांसों के हरुफ़ - -

न जाने क्या वजह थी, वो शख्स कभी -
खुल कर मिल ही न सका, मैंने 
तो ज़िन्दगी की किताब 
रख दी थी उसके 
सामने -
बेझिझक, बर्हनह सच की तरह, हैरत 
भरी नज़र से उसने देखा ज़रूर,
उलट पलट कर कई बार 
पढने की कोशिश 
भी की शायद, 
लेकिन 
उन्वान से आगे वो बढ़ ही न सका - - 
हाथों से सिर्फ़ सतही अहसास 
किया, दिल की गहराइयों 
को कभी छू न सका, 
कैसे ज़ाहिर 
करूँ 
कि इन ख़ामोश, सांसों के हरुफ़ में
हैं छुपे, बेतरतीब तूफ़ान ठहरे 
हुए, इन धडकनों में हैं 
शामिल कितने 
जज़्बाती 
भंवर 
आपस में उलझे हुए, कि इन रग़ों में 
में बहती है किसी की मुहोब्बत 
तकमील ए हयात के लिए, 
कि  बंजर आँखें 
तकती हों 
जैसे 
उम्र भर की मन्नत लिए सीने में - - 
एक मुश्त बरसात के लिए !
* *
- शांतनु सान्याल 
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/



Calm before the Storm 

Sunday, 3 March 2013

वो मैं नहीं - -

यक़ीनन वो मैं नहीं, जो तेरी ख़्वाबों में -
उभरता है, इक जाम छलकता 
हुआ सा, या कोई साहिर 
चाँद रात का, भरता 
हो ख़ुशबू जो 
फूलों 
में शब गहराते, वो मैं नहीं जो तेरी पेशानी 
में तारों की झालर सजाए, चश्म ए 
साहिल पे ज़िन्दगी लुटाये, 
बेहद मुश्किल है 
मेरी जां 
तसव्वुर को यूँ हक़ीक़त में बदलना, तपते 
सहरा से निकल, जज़्बात के दिलकश 
कहकशाँ पर चलना - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/


artist svetlana novikova