Thursday, 5 December 2013

कहीं न कहीं इक दिन - -

आईने का शहर कोई, फिर भी तेरी महफ़िल 
लगे बहोत फ़ीकी फ़ीकी, न कहीं कोई 
उभरता अक्स देखा, न ही नूर 
कोई तिलिस्म आमेज़,
हर चेहरे पे है इक 
नक़ली परत,
या कोई 
ख़त गुमनाम, हर निगाह गोया दर जुस्तजू -
ढूंढ़ती है ख़ुद का पता, इस मुखौटे के 
हुजूम में न जाने क्यूँ, वजूद 
भी अपना लगे कुछ 
कुछ अजनबी,
ये जहां 
है कैसी, न डुबाए पुरसुकून से, न हीं उभारे - 
ये ज़िन्दगी ! उड़ते अभ्र हैं, या है तेरी 
वो मुहोब्बत, मेरा दिल तलाशे 
सायादार इक ज़मीं, न 
हो जाएँ इस 
चाह में 
मेरी हसरतकुन आँखें, इक दिन बंजर कहीं,

* * 
- शांतनु सान्याल 



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