Friday, 6 December 2013

अंदाज़ ए ख़ुदा हाफ़िज़ - -

फिर तेरा अंदाज़ ए ख़ुदा हाफ़िज़, फिर 
मेरा क़तरा क़तरा बिखर जाना,
फिर तेरी नज़रों में उस 
मोड़ की रौशनी 
फिर शौक़ 
ए सैलाब का धीरे धीरे उतर जाना, इस 
किनाराकशी में हैं न जाने ख़म 
कितने, कभी डूबता संग 
ए साहिल ये ज़िन्दगी,
कभी तेरी आँखों 
में, मेरे 
अक्स का यूँ ही अचानक उभर आना, - 
इक अजीब सी है कशिश तेरी 
चाहत में ऐ हमनशीं, कभी 
जज़्बा ए क़यामत !
कभी मेरी 
तक़दीर का, तेरी हथेलियों में मेहँदी - -
की तरह संवर जाना, फिर तेरा 
अंदाज़ ए ख़ुदा हाफ़िज़, 
फिर मेरा क़तरा 
क़तरा बिखर 
जाना - - 

* * 
- शांतनु सान्याल 

http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
Chinese Artists, Abstract Paintings,