Tuesday, 26 November 2013

न जाने क्यूँ - -

न जाने क्यूँ, आज भी इक पहेली सी है 
तुम्हारी पलकों की परछाई, न 
जाने क्यूँ आज भी, जी 
चाहता है तुम्हें, यूँही 
निष्पलक, बस 
देखते रहें,
इक जलता चिराग़ तन्हा और सुदूर -
कोई दरगाह वीरान, न कोई 
दरख़्त दूर दूर तक, न 
ही पत्थरों में 
लिखी 
कोई भूली तहरीर,फिर भी न जाने क्यूँ, 
ज़िन्दगी सिर्फ़ चाहती है, तुम्हारी 
निगाहों में अपना पता 
तलाश करना, 
वो बूंदें !
जो कभी छलकी थीं पुरनम आँखों से - 
तुम्हारे, उन्हीं बूंदों में आज तक 
सिमटी सी है ज़िन्दगी 
अपनी - - 

* * 
- शांतनु सान्याल 

http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
daisies