Tuesday, 12 November 2013

आतिश ए दायरा - -

कहीं न कहीं आज भी उसके दिल में 
है अफ़सोस ज़रा, वो चाह कर 
भी मुझसे जुदा हो न 
सका, कहीं न 
कहीं मैं 
भी भीड़  में तन्हा ही रहा, चाह कर 
भी किसी से जुड़ न सका, 
इक अजीब सा रहा 
यूँ सिलसिला 
दरमियां
अपने, मुझसे ताउम्र बुतपरस्तिश 
न गई, और वो पत्थर से 
निकल कभी ख़ुदा 
हो न सका, 
इक -
तरसीम ए ख्बाब या इश्क़ हक़ीक़ी, 
न जाने क्या थी उसकी 
तिलस्मी चाहत,
लाख चाहा 
मगर 
उस मरमोज़ आतिश ए दायरा के 
बाहर कभी निकल ही न 
सका - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 


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