Sunday, 10 November 2013

बिखर न जाए कहीं - -

पुरअसरार इस रात की ख़ामोशी, कोई 
नज़दीक बहोत लेकिन नज़र न 
आए, निगाहों में समेटे 
चांद का अक्स 
इस तरह,
खुली वादियों में दिल कहीं भटक न -
जाए, क़सम है तुमको न खेलो 
डूबती साँसों से इस क़दर, 
साहिल के क़रीब 
आ कर कहीं 
इश्क़ -
मज़तरब, बेतरतीब लहरों में बिखर न 
जाए - -
* * 
- शांतनु सान्याल 

http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
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