Tuesday, 8 October 2013

रूह ख़ानाबदोश - -

न जाने कौन, जो देता है दस्तक अँधेरा -
घिरते, शाम ढलते इक चिराग़ 
जैसे जला जाता है, दिल 
की वीरान बस्ती 
में, बारहा 
लौट आती है मेरी रूह, तर्ज़ बाज़गश्त !
पुरअसरार वादियों का बदन 
छू कर, न जाने क्या 
है छुपा, उन 
आँखों 
की गहराइयों में, महकते हैं जज़्बात रात 
गहराते, उठते हैं दिल की धड़कनों में 
रह रह कर ख़ुशबुओं के, ठहरे 
हुए तूफ़ान अनगिनत !
फ़िर ख़्वाबों में 
भटकती 
है ज़िन्दगी हमराह कहकशाँ, बहोत दूर 
तलक, जहाँ मिलती है नदी की 
मानिंद, ये गरेज़ान शब !
सीने में दबाए राज़ 
गहरे, सुबह के 
समंदरी 
आग़ोश में, लबरेज़ कोई रूह ख़ानाबदोश
की मानिंद - - 
* * 
- शांतनु सान्याल  

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