Sunday, 13 October 2013

ख़ुश्बू की मानिंद - -

फिर तेरी निगाह ए गिरफ़्त है ज़िन्दगी,
फिर चाहता है दिल ख़ुश्बू की
मानिंद दूर तलक बिखर
जाना, थक से
चले हैं -
जिस्म ओ जां, इक बेइंतहा भटकाव - -
और लामहदूद ख़्वाहिशें, दिल
चाहता फिर तेरी, पलकों
के साए ठहर जाना,
न पूछ मुझ से
किस
तरह से गुज़री है शब तारीक का सफ़र !
हर सांस इक सदी, हर लम्हा
गोया उम्र क़ैद, तुझे खो
कर बहोत मुश्किल
था ज़िन्दगी
का फिर
उभर पाना, फिर चाहता है दिल ख़ुश्बू की
मानिंद दूर तलक बिखर जाना - -
* *
- शांतनु सान्याल
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
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