Wednesday, 11 September 2013

समीकरण ज़िन्दगी का - -

समीकरण ज़िन्दगी का आसां नहीं सुलझाना,
तमाम योग वियोग के बाद भी ज़रूरी 
नहीं, अंत में शून्य आना, नियति 
का अंकगणित है बहोत 
ही जटिल, सहज 
कहाँ सपनों 
का 
साकार होना, उनके सभी भविष्यवाणियाँ - -
रहे धरे के धरे, मस्तक की रेखाओं 
से है मुश्किल लड़ पाना, मझ -
धार की लहरों से निकल 
तो आई नैय्या, 
अद्भुत 
था उसका किनारे से लग डूब जाना, दूर तक 
गूंजती रही उसकी गुहार, सांध्य 
आरती के मध्य किसी ने 
भी न सुनी उसकी 
पुकार, डोलती 
नौका 
बता न पायी उसका ठिकाना, समीकरण - - 
ज़िन्दगी का आसां नहीं सुलझाना,
* * 
- शांतनु सान्याल 
http://sanyalsduniya2.blogspot.in/
art by elena balekha