Saturday, 10 August 2013

पूर्व अग्नि स्नान - -

अदृश्य, असीम, वो दिव्य आलोक जो 
भर जाए अंतर्मन की अथाह -
गहराई, फिर उदित 
हो तमस 
भेद 
सहस्त्र अश्वों के रथ में आसीन, - - 
युगांतकारी सूर्य, लिए देह 
में प्रज्वलित अनल 
शिखा, फिर 
गर्जना 
हो 
अनंत शंख नाद से एक बार, पुनश्च 
हो महोत्सव रिपु दहन का !
पुनः जागे सुप्त धरा 
लिए रक्त में 
बीज,
कुरुक्षेत्र के विस्मृत योद्धाओं का - - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
art of Nandalal Bose - India