Thursday, 8 August 2013

उपासना - -

तुम भोर की मख़मली स्वप्न हो !
आँख खुलते ही जो बिखर 
जाए, ओस बूंदों की 
तरह -
अंतःप्रेरणा हो तुम सदैव सुरभित, 
अनंतकालीन रोशन कोई 
नीलाभ नीहारिका,
क्या हो तुम 
क्या -
नहीं, अपरिभाषित कोई दिव्य - -
अनुभूति, शब्दों में जिसे 
ढाला न जा सके 
वो अद्वित्य 
सौन्दर्य 
की कोई कविता हो तुम या कोई 
आत्मलीन शतदल की हो 
कोमल भीगी 
पंखुडियां !
न जाने क्या हो तुम, मरू प्रांतर - - 
भी करें तुम्हारी उपासना !
* * 
- शांतनु सान्याल 

http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
art of Samir Mondal, Kolkata -India