Friday, 9 August 2013

माया जाल - -

पूर्व ज्ञात था मुझे, तुम चाह कर भी 
माया मुक्त न हो पाओगे !
अदृश्य श्रंखला तुम्हें 
रोकेगी पग पग, 
कुछ दूर जा 
फिर 
उसी बिंदु पर लौट आओगे, नियति 
की अपनी हैं अग्नि रेखाएं,
लाख प्रयास करे कोई 
लांघना है बहुत 
कठिन,
करतल की रेखाएं मिट गईं समय 
के साथ अपने आप, या 
उभरी हैं चेहरे पर 
झुर्रियों में 
बदल 
कर, इस मोड़ पर कुछ भी कहना है 
मुश्किल, तुलसी तले दीप 
जलने से पहले, मुझे 
मालूम है तुम 
लौट 
आओगे, तुम चाह कर भी माया - - 
मुक्त न हो पाओगे - - 
* * 
- शांतनु सान्याल  

http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
art by - caramen guedez