Sunday, 18 August 2013

बर्ग ए अफ़साने नज़र आए - -

न जाने क्या थीं मजबूरियां उनकी,
मिला के नज़र आशना, वो 
बहोत बेगाने से नज़र 
आए, यूँ मुड़ गए 
पलक - 
झपकते रौशनी छू कर,अपनी ही 
परछाइयों से वो बहोत -
अनजाने नज़र 
आए, 
तलाश करते रहे जिन्हें उजाले ओ 
अंधेरों के दरमियां, वो चेहरे 
मुखौटों वाले, नज़दीक 
से बहोत जाने 
पहचाने 
नज़र आए, बहोत दिलकश थे वो 
दूर के मंज़र, आबशारों में 
नहाए हुए, खिलते 
हुए गुलों से 
लबरेज़ 
वादियाँ, क़रीब पहुँचते ही वो सभी 
बर्ग ए अफ़साने नज़र आए,
मिला के नज़र आशना,
वो बहोत बेगाने 
से नज़र 
आए,
* * 
- शांतनु सान्याल 

बर्ग - पत्ते 
आशना - परिचित
आबशार - झरना  
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
art by poggy garr